ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पाबंदी लागू हुए कुछ ही समय बीता है, लेकिन शुरुआती आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। सरकारी ई-सेफ्टी आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 10 से 15 साल के बच्चों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वालों की संख्या 85.9 फीसदी से घटकर 81.5 फीसदी पर आ गई है। यानी करीब पांच में से चार बच्चे तमाम पाबंदियों के बाद भी किसी न किसी रूप में सोशल मीडिया पर सक्रिय बने हुए हैं।
कानून के प्रभावी होने के बाद भी बच्चों की ऑनलाइन मौजूदगी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। आंकड़े बताते हैं कि प्रतिबंध महज एक कागजी या तकनीकी रुकावट साबित हो रहा है, जिसे पार करने के लिए बच्चे नए-नए रास्ते निकाल रहे हैं।
उम्र सत्यापन को मात देने के हथकंडे
प्रतिबंध से बचने के लिए बच्चों ने तकनीक का तोड़ निकाल लिया है। शुरुआती मामलों से पता चलता है कि सोशल मीडिया अकाउंट बनाते समय गलत जन्मतिथि दर्ज करना और किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल करना आम हो गया है। इसके अलावा, वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क यानी VPN के जरिए जियो-रिस्ट्रिक्शन और आयु प्रतिबंधों को धत्ता बताया जा रहा है।
फेसियल रिकग्निशन जैसी आधुनिक डिजिटल एज-वेरिफिकेशन तकनीकें भी बच्चों के आगे फेल होती दिख रही हैं। ब्रिटेन में सामने आए कुछ मामलों में किशोरों ने चेहरे पर नकली मूंछ और दाढ़ी लगाकर फेशियल रिकग्निशन सिस्टम को भ्रमित करने में सफलता हासिल की है। कंपनियां कम उम्र के यूजर्स को रोकने के लिए पुख्ता डिजिटल पहचान प्रणालियों पर जोर दे रही हैं, लेकिन बच्चे हर बार कोई नया पैंतरा ढूंढ निकालते हैं।
टिकटॉक तक पहुंच बरकरार और प्लेटफॉर्म्स में बदलाव
पैरेंटल-कंट्रोल कंपनी क्वेस्टोडियो के आंकड़े बताते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में जुलाई के दौरान 13 से 15 साल के 25.9 फीसदी बच्चे टिकटॉक का इस्तेमाल कर रहे थे। कानून लागू होने से पहले यह आंकड़ा लगभग 27 फीसदी था। यानी इस प्लेटफॉर्म पर आंशिक गिरावट तो दर्ज हुई, लेकिन बच्चों की पहुंच पूरी तरह बाधित नहीं हो पाई।
दूसरी तरफ, कुछ खास आयु वर्गों में अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के इस्तेमाल में बढ़ोतरी भी दर्ज की गई है। जानकारों का कहना है कि यह इस बात का संकेत है कि पाबंदियों के दायरे में आने वाले बच्चे एक ऐप पर रोक लगने के बाद फौरन दूसरे प्लेटफॉर्म्स का रुख कर रहे हैं।
क्या है 10 दिसंबर 2025 के इस कानून का मकसद?
ऑस्ट्रेलिया में बच्चों को सोशल मीडिया के संभावित मानसिक नुकसान से बचाने के लिए यह कानून 10 दिसंबर 2025 को लागू किया गया था। सरकार का उद्देश्य कम उम्र में सोशल मीडिया की लत और उससे जुड़ी समस्याओं पर लगाम लगाना था। हालांकि, शुरुआती रुझान साफ कर रहे हैं कि सिर्फ कड़े प्रतिबंध लगा देने भर से बच्चों की ऑनलाइन मौजूदगी पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकती।
विशेषज्ञों का मानना है कि दिन में कई घंटे लगातार रील्स देखने जैसी आदतें बच्चों के मानसिक विकास के लिए गंभीर खतरा हैं। लेकिन इसके साथ ही यह डर भी जताया जा रहा है कि पूरी तरह पाबंदी लगाने से बच्चे छिपकर सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने लगेंगे। ऐसी स्थिति में साइबर बुलिंग या किसी अन्य ऑनलाइन खतरे का सामना होने पर वे अपने माता-पिता या अभिभावकों से मदद मांगने में झिझक सकते हैं, जिससे समस्या और गंभीर हो सकती है।
