भारतीय जनता पार्टी ने अपनी नई राष्ट्रीय टीम में राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को एक बार फिर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है। पार्टी के इस फैसले को जमीनी राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाले वरिष्ठ नेताओं के साथ संतुलन साधने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। राजे को संगठन में यह पद ऐसे समय में मिला है जब राज्य में भजनलाल सरकार के कार्यकाल का मध्य दौर चल रहा है और पार्टी आगामी राजनीतिक समीकरणों को साधने में जुटी है।
राजस्थान चुनावों के आंकड़े और सियासी फेरबदल
साल 2023 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने राजस्थान में 115 सीटें हासिल कर बहुमत तो प्राप्त किया, लेकिन यह उस प्रचंड बहुमत से कम था जो साल 2003 में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में पार्टी को मिला था। तब राजे ने पहली बार पार्टी का नेतृत्व करते हुए 120 सीटें दिलाई थीं। इसके बाद मोदी लहर और राजे के चेहरे पर 2013 के चुनावों में बीजेपी ने 163 सीटों का आंकड़ा छुआ था।
2023 के बाद से पार्टी ने राजस्थान में नेतृत्व की नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने का फैसला किया। साल 2024 के लोकसभा चुनावों में भी राजे की सक्रियता मुख्य रूप से उनके बेटे दुष्यंत सिंह के निर्वाचन क्षेत्र झालावाड़-बारां तक ही सीमित रही, जहां उन्होंने प्रचार की कमान संभाली थी।
लोकसभा चुनावों के नतीजे और जातीय समीकरण
साल 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को राज्य में 11 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा और पार्टी सभी 25 सीटें जीतने का अपना पुराना रिकॉर्ड नहीं दोहरा पाई। खास बात यह है कि जिन 11 सीटों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा, वे सभी जाट बहुल क्षेत्र माने जाते हैं।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, राजे की धौलपुर के जाट राजघराने से पारिवारिक पृष्ठभूमि और गुर्जर समुदाय से वैवाहिक संबंध (बहू निहारिका राजे) उन्हें राज्य के जटिल जातीय समीकरणों में खास मजबूती देते हैं। राजे खुद को राजस्थान की '36 कौमों' से जुड़ा हुआ बताती रही हैं, जो उनकी राजनीतिक यूएसपी का अहम हिस्सा है।
संगठन में सम्मानजनक यथास्थिति
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राजे के करीबी नेता अक्सर यह साफ करते रहे हैं कि वह खुद राज्य के नए नेतृत्व को आगे बढ़ने का मौका देना चाहती हैं। हालांकि, उनकी लोकप्रियता और चुनावी मैदान में समीकरण पलटने की क्षमता को पार्टी आलाकमान नजरअंदाज नहीं कर सकता।
आगामी 2028 के विधानसभा चुनावों से पहले, जब सरकार के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी का सामना करने की चुनौती होगी, तब राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद पर बनाए रखना पार्टी के लिए एक व्यावहारिक और सुरक्षित राजनीतिक कदम माना जा रहा है।
