छिंदवाड़ा। “मिट्टी स्वस्थ होगी, तो खेती समृद्ध होगी और किसान खुशहाल होगा”—इस सोच को साकार करते हुए विकासखंड मोहखेड़ के ग्राम कामठी के किसान प्राकृतिक एवं टिकाऊ खेती की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के अंतर्गत चयनित कामठी क्लस्टर में किसानों ने ढैंचा की बुवाई कर उसे हरी खाद के रूप में खेतों में अपनाया है।किसानों की यह पहल कम लागत में मृदा स्वास्थ्य सुधारने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक सकारात्मक उदाहरण बन रही है।
खेत में तैयार हुई हरी खाद, मिट्टी को मिला प्राकृतिक पोषण
कामठी क्लस्टर के 9 किसानों ने अपने खेतों में ढैंचा की बुवाई की। पर्याप्त वृद्धि होने के बाद किसानों ने ढैंचा की फसल को खेत में ही जुताई कर मिट्टी में मिला दिया। इससे फसल का जैवभार खेत की मिट्टी में वापस पहुंचा और जैविक पदार्थ एवं पोषक तत्वों के प्राकृतिक पुनर्चक्रण में मदद मिली।
ढैंचा को हरी खाद के रूप में खेत में मिलाने से मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने, मृदा संरचना सुधारने और जल धारण क्षमता बेहतर करने में सहायता मिलती है। साथ ही आगामी फसल के लिए मिट्टी को प्राकृतिक रूप से तैयार करने में भी यह तकनीक उपयोगी साबित हो रही है।
नाइट्रोजन स्थिरीकरण में भी उपयोगी
ढैंचा एक दलहनी फसल है। इसकी जड़ों में पाए जाने वाले राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण में सहायक होते हैं। खेत में ढैंचा की जैविक सामग्री मिलाने के बाद मिट्टी के सूक्ष्मजीव इसके अवशेषों को विघटित करते हैं, जिससे पोषक तत्व आगामी फसल के लिए उपलब्ध होने में सहायता मिलती है।
इस तरह हरी खाद की तकनीक मृदा उर्वरता बनाए रखने के साथ-साथ खेत में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग का माध्यम बन रही है।
आलू की खेती से पहले बढ़ रहा हरी खाद का चलन
छिंदवाड़ा जिले में किसान अब मुख्य फसल से पहले ढैंचा और सनई जैसी फसलों को हरी खाद के रूप में अपनाने लगे हैं। विशेष रूप से आलू की फसल से पहले खेत में ढैंचा एवं सनई की बुवाई कर बाद में उसे मिट्टी में मिलाने की पद्धति किसानों के बीच लोकप्रिय हो रही है।
कम लागत में खेत में ही जैविक पदार्थ तैयार होने से किसानों को बाहरी इनपुट पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है। यही कारण है कि हरी खाद की तकनीक प्राकृतिक और टिकाऊ कृषि की दिशा में उपयोगी विकल्प के रूप में सामने आ रही है।
कामठी के किसानों की पहल बनी प्रेरणा
कामठी क्लस्टर के किसानों ने जिस तरह हरी खाद की तकनीक को अपनाया है, वह आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणादायी है। खेत में ही तैयार होने वाली हरी खाद के माध्यम से मिट्टी को पोषण देने की यह पहल कम लागत, स्वस्थ मिट्टी और टिकाऊ खेती की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
इन किसानों ने अपनाई ढैंचा की हरी खादकामठी क्लस्टर के कृषक श्री रामप्रसाद कड़वे, श्री किशोर डिगरसे, श्री राजेश राऊत, श्री जीतेन्द्र राऊत, श्रीमती अनीता घागरे, श्रीमती कला डिगरसे, श्रीमती मधु फरकारे, श्री रघुवर भादे एवं श्री टांटी डिगरसे ने अपने खेतों में ढैंचा की बुवाई कर हरी खाद की तकनीक अपनाई।
इन किसानों का प्रयास मृदा स्वास्थ्य संरक्षण के साथ प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में जिले में हो रहे सकारात्मक बदलाव का उदाहरण है। स्वस्थ मिट्टी से स्वस्थ फसल और स्वस्थ फसल से समृद्ध किसान की दिशा में कामठी क्लस्टर की यह पहल अन्य किसानों को भी प्राकृतिक एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियां अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है।
