सांवलियाजी मंदिर के भंडार में इस बार भी करोड़ों रुपए का चढ़ावा सामने आया है। पहले राउंड की गिनती में ही 11 करोड़ 1 लाख 51 हजार रुपए की नकद राशि मिली। हरियाली अमावस्या के कारण अब 13 अगस्त को दूसरे राउंड की गिनती होगी।
अंतिम गिनती के बाद मंदिर को मिले कुल चढ़ावे की पूरी राशि सामने आएगी।
1. सांवलियाजी मंदिर में इतना चढ़ावा क्यों आता है?
चित्तौड़गढ़ जिले का श्री सांवलियाजी मंदिर मेवाड़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। भगवान सांवलियाजी को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है और हर महीने बड़ी संख्या में भक्त यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। कई श्रद्धालु मनोकामना पूरी होने के बाद भगवान के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए नकद राशि और अन्य सामग्री चढ़ाते हैं। वहीं कई भक्त अपनी श्रद्धा और विश्वास के अनुसार दान करते हैं। इसी कारण मंदिर के भंडार में नियमित रूप से बड़ी मात्रा में चढ़ावा जमा होता है।
2. भंडार खोलकर गिनती क्यों की जाती है?
मंदिर में श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाई गई नकद राशि भंडार में जमा होती रहती है। एक निश्चित अवधि के बाद इस भंडार को खोला जाता है और जमा राशि की आधिकारिक गिनती की जाती है। बुधवार को भी राजभोग आरती के बाद सुबह 11 बजे भंडार खोला गया। मंदिर मंडल के अधिकारी और कर्मचारी मौजूद रहे, ताकि चढ़ावे की गिनती व्यवस्थित और पारदर्शी तरीके से की जा सके।
3. पहले राउंड में 11 करोड़ से ज्यादा कैसे निकले?
भंडार की गिनती शुरू होने के बाद पहले चरण में ही 11 करोड़ 1 लाख 51 हजार रुपए की नकद राशि सामने आई। यह सिर्फ पहले राउंड की गिनती का आंकड़ा है। भंडार में अभी और चढ़ावा मौजूद है, जिसकी गिनती बाकी है। इसलिए मंदिर को प्राप्त कुल चढ़ावे की अंतिम राशि फिलहाल सामने नहीं आई है और आगे की गिनती के बाद इसमें और बढ़ोतरी हो सकती है।
4. दूसरे राउंड की गिनती 13 अगस्त को क्यों होगी?
हरियाली अमावस्या के कारण 12 अगस्त को भंडार की गिनती रोक दी गई है। अब बची हुई राशि की गिनती 13 अगस्त को दूसरे राउंड में की जाएगी। दूसरे चरण में भंडार में बची नकद राशि और अन्य चढ़ावे की गिनती की जाएगी। इसके बाद सभी चरणों की राशि को मिलाकर मंदिर को मिले कुल चढ़ावे का आंकड़ा सामने आएगा।
5. करोड़ों का चढ़ावा क्या बताता है?
सांवलियाजी मंदिर में पहले ही राउंड में करोड़ों रुपए का चढ़ावा सामने आना श्रद्धालुओं की गहरी आस्था को दर्शाता है। भक्तों के लिए यह सिर्फ आर्थिक दान नहीं, बल्कि भगवान के प्रति श्रद्धा, विश्वास और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। कोई भक्त मनोकामना पूरी होने के बाद भेंट चढ़ाता है, तो कोई अपनी क्षमता के अनुसार भगवान के चरणों में दान करता है। यही वजह है कि सांवलियाजी का दरबार राजस्थान के प्रमुख आस्था केंद्रों में अपनी अलग पहचान रखता है।
