Tuesday, 3 November 2026
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बुरहानपुर में अनूठी पहल: डीजे के शोर से दूर, अनुपयोगी कचरे से बनाई भगवान गणेश की चलित झांकी

संक्षेप में

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में रावल परिवार ने डीजे के शोर से मुक्ति और प्राचीन परंपराओं को जीवित रखने के लिए अनुपयोगी वस्तुओं से भगवान गणेश की एक चलित झांकी बनाई है। इस झांकी में इंसानों की जगह भगवान गणेश के वाहन मूषकों को लेजिम खेलते और मलखंभ करते हुए दिखाया गया है।

मुख्य बातें

  • बुरहानपुर के रावल परिवार ने अनुपयोगी वस्तुओं से गणेश की चलित झांकी बनाई है।
  • झांकी में डीजे के बजाय पारंपरिक अखाड़ा संस्कृति, लेजिम और मलखंभ को दर्शाया गया है।
  • इंसानों की जगह भगवान गणेश के वाहन मूषकों को लेजिम खेलते हुए दिखाया गया है।
  • इस पहल का उद्देश्य ध्वनि प्रदूषण को कम करना और नई पीढ़ी को पुरानी परंपराओं से जोड़ना है।
मध्य प्रदेश
बुरहानपुर में अनूठी पहल: डीजे के शोर से दूर, अनुपयोगी कचरे से बनाई भगवान गणेश की चलित झांकी

बुरहानपुर में गणेश उत्सव के दौरान ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति और प्राचीन परंपराओं को सहेजने के लिए एक अनूठी पहल सामने आई है। शहर के रावल परिवार ने घर में बेकार पड़ी वस्तुओं से भगवान गणेश की एक चलित झांकी तैयार की है। इस झांकी में डीजे के शोर-शराबे के बजाय बुरहानपुर की प्राचीन अखाड़ा संस्कृति, लेजिम और मलखंभ जैसे पारंपरिक खेलों को जीवंत किया गया है।

मूषक खेल रहे लेजिम, डीजे संस्कृति को संदेश

इस चलित झांकी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें इंसानों की जगह भगवान गणेश के वाहन मूषकों को लेजिम खेलते हुए दर्शाया गया है। दफड़े और पारंपरिक बाजों की धुन पर एक पैर पर संतुलन बनाकर करतब करते ये मूषक लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रहे हैं। झांकी के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि गणेश उत्सव में पश्चिमी संस्कृति और तेज आवाज वाले डीजे के बजाय अपनी संस्कृति से जुड़ा जाए।

हितार्थ रावल और सिद्धांत रावल की प्रेरणा से परिवार के सभी सदस्यों ने मिलकर इस झांकी को तैयार किया है। इसकी साज-सज्जा की जिम्मेदारी पारस रावल और खुशी रावल ने संभाली।

बिना महंगे सामान के तैयार हुई झांकी

इस पूरी झांकी को बनाने में किसी भी तरह के महंगे या नए सामान का इस्तेमाल नहीं किया गया है। घर में मौजूद अनुपयोगी और बेकार वस्तुओं को एकत्रित कर उन्हें नया रूप दिया गया, जिसके बाद परिवार के छोटे-बड़े सदस्यों ने मिलकर इसे चलित झांकी का स्वरूप दिया।

परिवार के सदस्यों का कहना है कि गणेश उत्सव के दौरान तेज आवाज में बजने वाले डीजे से न केवल इंसानों को परेशानी होती है, बल्कि पशु-पक्षियों और पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ता है। 11वीं कक्षा के छात्र हितार्थ रावल ने बताया कि उत्सव का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अपनी पुरानी परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी है।

पारंपरिक खेलों का प्रदर्शन

झांकी के जरिए चौराहे पर होने वाले अखाड़ा प्रदर्शन, मलखंभ और हाथों में चक्र चलाने जैसे पारंपरिक करतबों को बेहद बारीकी से दर्शाया गया है। बुरहानपुर में गणेश स्थापना से लेकर विसर्जन तक डीजे का चलन तेजी से बढ़ा है, ऐसे में रावल परिवार की यह पहल पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ पारंपरिक संस्कृति को बचाने का एक मजबूत विकल्प बनकर सामने आई है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

बुरहानपुर में रावल परिवार ने गणेश उत्सव के लिए क्या अनूठी पहल की है?

रावल परिवार ने घर की अनुपयोगी और बेकार वस्तुओं से भगवान गणेश की एक चलित झांकी तैयार की है, जिसमें डीजे के बजाय पारंपरिक अखाड़ा संस्कृति और लेजिम को दर्शाया गया है।

इस झांकी की मुख्य विशेषता क्या है?

इस झांकी की सबसे खास बात यह है कि इसमें इंसानों के स्थान पर भगवान गणेश के वाहन मूषकों को लेजिम खेलते और मलखंभ जैसे पारंपरिक करतब करते हुए दिखाया गया है।

झांकी तैयार करने में किन चीजों का उपयोग किया गया है?

इस झांकी को तैयार करने में किसी भी महंगे सामान का उपयोग नहीं किया गया है। घर में मौजूद अनुपयोगी वस्तुओं को एकत्रित कर परिवार के सदस्यों ने इसे नया रूप दिया है।

इस पहल का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इस पहल का उद्देश्य गणेश उत्सव के दौरान तेज डीजे और ध्वनि प्रदूषण से बचना तथा बुरहानपुर की प्राचीन अखाड़ा संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।