राजस्थान में डिजिटल शिक्षा का सपना अभी भी अधूरा है। दरअसल सरकार एक ओर सरकारी स्कूलों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल लर्निंग और तकनीक आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए लगातार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन दूसरी ओर जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर बयां कर रही है। यू-डाइस की ताजा रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के 9,227 स्कूलों में आज भी बिजली की सुविधा नहीं है, जिनमें 7,076 सरकारी विद्यालय शामिल हैं। बिजली नहीं होने के कारण इन स्कूलों में स्मार्ट बोर्ड, कंप्यूटर, प्रोजेक्टर, पंखे और शुद्ध पेयजल के लिए लगाए गए फिल्टर तक इस्तेमाल नहीं हो पा रहे हैं। सबसे ज्यादा परेशानी ग्रामीण, आदिवासी और दूरस्थ रेगिस्तानी इलाकों के विद्यार्थियों को झेलनी पड़ रही है, जहां बच्चे आज भी मूलभूत सुविधाओं के बिना पढ़ाई करने को मजबूर हैं। हालात इतने खराब हैं कि कई स्कूलों में जर्जर भवन हैं, पर्याप्त कक्षाएं नहीं हैं और एक ही कमरे में दो से तीन कक्षाओं का संचालन किया जा रहा है। कई जगह प्रयोगशाला, पुस्तकालय और डिजिटल कक्ष जैसी सुविधाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं। हालांकि इस समस्या के समाधान के लिए शिक्षा विभाग ने बिजली विहीन स्कूलों में सौर ऊर्जा आधारित सिस्टम लगाने की योजना बनाई है। विभाग के मुताबिक सोलर प्लांट लगने के बाद स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर, पंखे, पेयजल फिल्टर और अन्य डिजिटल सुविधाएं सुचारु रूप से संचालित हो सकेंगी। अब सवाल आखिर यही है कि आखिर प्रदेश के हजारों बच्चों तक डिजिटल शिक्षा का लाभ वास्तव में कब पहुंच पायेगा।