हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष भगवान श्रीकृष्ण जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिससे पर्व का धार्मिक महत्व और बढ़ गया है। भक्त इस दिन लड्डू गोपाल की विधि-विधान से पूजा करते हैं और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए उपवास रखते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था, इसलिए इस पर्व की मुख्य पूजा रात के निशिता काल में की जाती है। इस साल लड्डू गोपाल के जन्मोत्सव का निशिता काल 4 सितंबर की रात 11:57 बजे से शुरू होकर 5 सितंबर को रात 12:43 बजे तक रहेगा। कुल 46 मिनट की इस अवधि में भगवान के प्राकट्य का उत्सव मनाया जाएगा।
जन्माष्टमी व्रत के नियम और संयम
व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन करना जरूरी माना गया है। व्रत से एक दिन पहले यानी 3 सितंबर से ही सात्विक भोजन का पालन करना चाहिए। इसके साथ ही विचार, व्यवहार और वाणी में संयम रखने की सलाह दी जाती है।
व्रत के दौरान मन में किसी के प्रति द्वेष या नकारात्मकता न लाएं और झूठ बोलने से बचें। जन्माष्टमी का उपवास भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के सूर्योदय से शुरू होकर नवमी तिथि के सूर्योदय तक मान्य होता है। इस पूरे दिन अन्न का सेवन वर्जित रहता है, हालांकि भक्त अपनी शारीरिक क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार फल, दूध या अन्य फलाहार ग्रहण कर सकते हैं।
पूजा विधि और जन्मोत्सव की प्रक्रिया
जन्माष्टमी के दिन सुबह 4:30 से 5:15 बजे के बीच ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। पूजा स्थल की सफाई के बाद हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर व्रत और पूजा का संकल्प लिया जाता है।
रात को निशिता काल के समय शंख और घंटियों की ध्वनि के साथ बाल गोपाल का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस दौरान लड्डू गोपाल को पंचामृत से स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। चंदन, फूल और माला से श्रृंगार करने के बाद उन्हें सुंदर पालने में विराजमान कर लोरी या भजन गाते हुए झुलाया जाता है।
भोग और व्रत का पारण
भगवान को माखन-मिश्री, पंजीरी, पंचमेवा, फल और विभिन्न मिठाइयों का भोग लगाया जाता है। इसके बाद आरती कर प्रसाद वितरित किया जाता है। पारिवारिक परंपरा के आधार पर कुछ लोग मध्यरात्रि की पूजा के तुरंत बाद व्रत खोल लेते हैं, जबकि कुछ लोग अगले दिन सूर्योदय के पश्चात पारण करते हैं।
