जीवन में परिपूर्णता का अहसास एकांकियों में नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक परिवेश की सामूहिक चेतना में निहित है। इसी निरंतरता और पूर्णता की भावना को जीने के लिए हमारे तीज-त्योहार और सांस्कृतिक पर्व प्रेरित करते हैं। श्रावण मास की खुशियों से लेकर रक्षाबंधन के धागों और अनंत चतुर्दशी के अनुष्ठानों तक, हमारी हर परंपरा जीवन को एक सूत्र में पिरोने का काम करती है।
वैदिक परंपरा में जीव यात्रा को अनंत सफर माना गया है। इस यात्रा के दौरान कर्म और धर्म की साधना के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करता है। अनंत चतुर्दशी का पर्व इसी यात्रा को बिना किसी बाधा के पूरा करने और भगवान विष्णु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है।
विष्णु का अर्थ विस्तार और सीमाओं का बंधन तोड़ना
विष्णु शब्द का शाब्दिक अर्थ ही विस्तार है। जीवन में सीमाओं के दायरे में रहकर किसी प्रकार का विस्तार संभव नहीं है। अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान विष्णु से यह प्रार्थना की जाती है कि वे मनुष्य को जीवन की इस अनंत यात्रा को बिना किसी अवरोध के पूरा करने में सहायता दें।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह पर्व मनुष्य को जड़ता त्यागकर सक्रिय बने रहने का संदेश देता है। निरंतर गतिशीलता बनाए रखने से दिल और दिमाग में जोश, उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इससे मन, वचन और कर्म पर छाए अंधकार को दूर कर प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।
ऐतरेय ब्राह्मण का 'चरैवेति, चरैवेति' संदेश
जीवन की गतिशीलता के इस सिद्धांत को वेदों और उपनिषदों में कई रूपों में समझाया गया है। ऐतरेय ब्राह्मण के तीसरे अध्याय के तीसरे खंड में इंद्र देवता और राजा हरिश्चंद्र के पुत्र रोहित के संवाद के माध्यम से 'चरैवेति, चरैवेति' (चलते रहो) का उपदेश दिया गया है।
"जो मनुष्य बैठा रहता है, उसका भाग्य भी रुक जाता है, लेकिन निरंतर विचरण करते रहने से व्यक्ति का सौभाग्य भी उसके साथ चलने लगता है।"
इस प्राचीन ग्रंथ में आलस्य और प्रमाद का त्याग कर ज्ञान, कर्म और भक्ति के मार्ग पर चलने का आह्वान किया गया है। ग्रंथ के श्लोकों में चार युगों—कलियुग, द्वापर, त्रेता और सतयुग—को मानव मन की चार अलग-अलग अवस्थाओं के रूप में परिभाषित किया गया है।
मन की चार अवस्थाएं और कर्मशीलता
इंद्र देव ने रोहित को समझाते हुए बताया कि जो व्यक्ति जागते हुए भी कोई कामकाज नहीं करता, उसकी स्थिति कलियुग के समान है। वहीं, सचेत होने के बावजूद आलस्य के कारण निष्क्रिय रहना द्वापर युग की स्थिति को दर्शाता है।
इसके अगले चरण में त्रेता युग की अवस्था आती है, जहां व्यक्ति काम करने के लिए मानसिक रूप से तैयार तो होता है, लेकिन उसे आरंभ नहीं कर पाता। इसके विपरीत, जो मनुष्य अपने विचारों को अमलीजामा पहनाने के लिए कर्मशील हो जाता है, उसकी वह अवस्था सतयुग के तुल्य होती है।
अंतिम संदेश में सूर्य की निरंतर गतिशीलता का उदाहरण देते हुए यह प्रेरणा दी जाती है कि मनुष्य को भी बिना रुके अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना चाहिए। गति में ही प्रगति का यह सूत्र अनंत चतुर्दशी के पर्व को जीवन और चेतना के साथ जोड़ता है।
