सुना था कि, डूबने वाले को एक तिनके का सहारा ही काफी है...हर व्यक्ति के जीवन में  एक तिनके की बहुत अहमियत होती है....इस लौकिक संसार में सीधे सादे, कमजोर और निरीह व्यक्ति के अस्तित्व की रक्षा के लिए, उसका एक छोटा सा प्रयास, किसी तिनके के सहारे जैसा ही होता है...घर, परिवार, कुटुंब, समाज, देश ही नहीं, दुनिया भर में, आज का ज्वलंत विषय भी यही है कि, विकास की इस अंधी दौड़ में सबसे पीछे रह गए हर व्यक्ति को, सम्मानजनक जीवन जीने के लिए एक तिनके के सहारे की जरुरत है...समावेशी विकास की इस अवधारणा में हर व्यक्ति के सामान्य सुख और सुविधा के अहसास में, एक तिनका बहुत अहमियत रखता है...एक पक्षी के लिए एक एक तिनके को अपनी आवश्यकता के अनुसार चुनना... और घरोंदे को बुनना आसान नहीं है, फिर भी वह अपनी भावनाओं में संभावनाओं को तलाशता है न...जब वह योग्यता और क्षमता से एक एक तिनके को चुन कर, अपने सपने के आशियां को बुनता है, तो फिर एक व्यक्ति क्यों नहीं कर सकता...कर सकता है, बहुत अच्छी तरह से कर सकता है...चुनौतियां आती है और आएंगी, लेकिन प्रयासों से विमुख होना भी तो असफलता की निशानी है...विपरीत समय में धैर्य, संयम और साहस के साथ, अभाव में भाव का एक छोटा सा तिनका भी, सफलता के आधार को मजबूत करता है...बचपन में सुनी कहानियों और किस्सों में ही नहीं, साहित्य की हर विधा में, एक छोटे से तिनके ने, जीवन के मर्म को बड़ी शिद्दत से अहसास कराया है...हास, उपहास और परिहास में शब्दों और भावनाओं से लिपटा, तिनके का एक छोटा सा टुकड़ा, दिल के अंदर जो घाव पैदा करता है, रेशम से पतले लेकिन मजबूत रिश्तों को नासूर बना देता है...कबीर ने इसकी ओर संकेत करते हुए कह भी दिया कि...तिनका कबहुं ना निन्दिये, जो पांवन तर होय...कबहुं उड़ी आंखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय...घर परिवार ही नहीं, कुटुंब, समाज, देश और दुनिया में हर व्यक्ति का अपना महत्व होता है... और ज्यों ही उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है...बड़ी दिक्कत होती है...साहित्य की हर विधा में, संकेतों से जीवन के हर मर्म को तिनके से जोड़कर, संदेश दिए जाते रहे हैं... चोर की दाढ़ी में तिनका का मतलब तो सभी जानते हैं...तिनका उतारना और छप्पर रख देना, तिनका तोड़ना, तिनका न रहना, तिनका भी न तोड़ सकना, या तिनका हो जाना, बहुत छोटे में काफी कुछ कह जाता है... दांत कुरेदने को तिनका न रहने का मतलब, सब कुछ लूट लिया जाना हो सकता है, तो जब कोई निर्धन व्यक्ति, किसी धनवान व्यक्ति को खाने के लिए बुलाए, तो सिर्फ इतना कहने से भी काम चल जाता है कि... बिजली मेहमान, घर में नहीं तिनका...तिनके के इस छोटे से शब्द में जीवन को जीने की जिजीविषा है तो, जोश जज्बा और जुनून भी, बनना, बिगड़ना, हास परिहास उपहास, संघर्ष और निर्माण, अकेलापन और बेबसी, मुश्किल में सहारा, यानी जीवन का हर एक रंग रूप, इस छोटे से शब्द में समाया हुआ है...कवियों और शायरों की दुनिया भी अजीब होती है...कण से मण तक का सफ़र तय करते हुए, जो कुछ भी उनकी नजरों के सामने से गुजरता है, दिल और दिमाग से होता हुआ शब्दों के तिलिस्म से बुना कल्पनाओं का घरोंदा, उस एक पक्षी की तरह चुनते हुए एक तिनके की तरह होता है... कहा गया है कि तिनका तिनका जोड़कर नीड़ बन जाता है...जीवन की सच्चाई भी यही है... सपनों का महल बनाने के लिए तिनका तिनका जोड़ना पड़ता है...मुनव्वर राना ने आर्थिक विद्रूपता को बहुत ही सरल शब्दों में यूं बयान किया कि, भटकती है हवस दिन-रात सोने की दुकानों में, ग़रीबी कान छिदवाती है तिनका डाल देती है....तो जलाल लखनवी ने अभाव में भाव पैदा करके, वक्त बेवक्त उसका अहसास करने वालों, या फिर उसके भार से दोहरी होती, और झुकती कमर के दर्द को बेपर्दा करते हुए कह भी दिया कि... जिस ने कुछ एहसान किया इक बोझ सर पर रख दिया, सर से तिनका क्या उतारा सर पे छप्पर रख दिया...जीवन में एक तिनके की अहमियत को उजागर करते हुए... अहसन यूसुफ़ ज़ई ने लिखा कि...काग़ज़ की नाव हूं जिसे तिनका डुबो सके, यूं भी नहीं कि आप से ये भी न हो सके....तो जीवन के दुःख और दर्द को दूर करने, और सुख के लिए किए जा रहे अथक प्रयासों की ओर संकेत करते हुए... हसीब सोज़ ने कहा कि...दर्द आसानी से कब पहलू बदल कर निकला, आंख का तिनका बहुत आंख मसल कर निकला...तो मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी के शब्दों में...एक निराशा भी झलकती है कि... हमेशा तिनके ही चुनते गुज़र गई अपनी, मगर चमन में कहीं आशियां बना न सके... ज़फ़र इक़बाल ने कहा कि.... हाथ पैर आप ही मैं मार रहा हूं, फ़िलहाल, डूबते को अभी तिनके का सहारा कम है... तो दाग़ देहलवी कहते है कि... मिरे आशियाने के थे चार तिनके, चमन लुट गया आंधियां आते आते...गति में प्रगति है...राजकपूर की फिल्म श्री चार सौ बीस में शैलेन्द्र ने लिखा है कि, चलना जीवन की कहानी, रुकना मौत की निशानी है...जीवन के इस पूरे सफ़र और कार्य व्यवहार के इस कारोबार में, सपने का घरोंदा... तिनके तिनके को ही चुन कर बुना जा सकता है, जैसे एक कबूतर को एक एक तिनका चुनते... और अपने सपनों के घरोंदे को बुनते देखा...