बच्चों को संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं बुजुर्ग माता-पिता, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बुजुर्गों की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संबंधित ट्रिब्यूनल को उनके बच्चों और बहू-बेटे को संपत्ति से बेदखल करने का आदेश देने का अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बुजुर्ग माता-पिता के अधिकारों से जुड़े एक अहम मामले में कहा कि सीनियर सिटीजन्स अपने बच्चों को संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि बढ़ती उम्र असुरक्षा या अपमान का पर्याय नहीं होनी चाहिए और हर व्यक्ति को जीवनभर गरिमा के साथ जीने का अधिकार है।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें बेटे और बहू को मकान से बेदखल करने के ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत बुजुर्गों की गरिमा और सुरक्षा के लिए ट्रिब्यूनल बच्चों को संपत्ति से निकालने का आदेश दे सकता है।

बुजुर्ग मां को वृद्धाश्रम जाना पड़ा

यह मामला लखनऊ के विकास नगर निवासी रवि कांत गुप्ता की अपील से जुड़ा था। गुप्ता ने 5 जून 2022 को अपने बेटे को मकान से बेदखल करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के पास आवेदन दिया था। यह मकान उनकी स्वयं अर्जित संपत्ति थी।

मामला तब सामने आया जब गुप्ता की 81 वर्षीय मां को घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद SDM ने 15 नवंबर 2022 को बेटे की बेदखली का आदेश दिया। जिला मजिस्ट्रेट ने 9 अगस्त 2023 को इस आदेश को बरकरार रखते हुए बेटे और बहू को मकान खाली करने का निर्देश दिया।

हाईकोर्ट ने आदेश कर दिया था रद्द

बेटे और बहू ने SDM और जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि 2007 का कानून बुजुर्गों को अपनी संपत्ति से बच्चों को बेदखल करने का अधिकार नहीं देता। इसके बाद हाईकोर्ट ने दोनों आदेश रद्द कर दिए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने अब हाईकोर्ट के इस फैसले को पलटते हुए वरिष्ठ नागरिकों की गरिमा, सम्मान और सुरक्षा को कानून के उद्देश्य का अहम हिस्सा माना है। कोर्ट ने कहा कि किसी सभ्य समाज की पहचान इस बात से भी होती है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कितना सम्मानजनक व्यवहार करता है।