रूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा है कि सुरक्षा परिषद में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने ब्राजील और भारत की उम्मीदवारी का समर्थन किया है।
लावरोव ने UNSC में पश्चिमी देशों की अतिरिक्त सीटों का विरोध किया है। उन्होंने जर्मनी और जापान का नाम लेते हुए उन पर 'सैन्यवाद और बदले की भावना की ओर बढ़ने' का आरोप लगाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुधार प्रक्रिया के दौरान मौजूदा स्थायी सदस्यों के अधिकारों और शक्तियों में कोई कटौती नहीं होनी चाहिए।
UNSC में भारत की दावेदारी के मुख्य आधार
दुनिया की 17% आबादी यानी 142 करोड़ की आबादी वाला भारत वैश्विक मंच पर सबसे मजबूत दावेदार माना जाता है। पिछले एक दशक में भारत की औसतन सालाना विकास दर 7% से अधिक रही है, जो चीन को छोड़कर किसी भी प्रमुख देश की तुलना में सबसे ज्यादा है।
थिंक टैंक 'अटलांटिक काउंसिल' के सर्वे के मुताबिक, यदि आने वाले समय में UNSC का विस्तार होता है, तो भारत के स्थायी सदस्य बनने की संभावना 26% तक आंकी गई है। इसके अलावा, भारत परमाणु शक्ति संपन्न देश है और निरस्त्रीकरण कार्यक्रमों में अहम भूमिका निभा सकता है।
चार बड़ी अड़चनें: वीटो से लेकर चीन का रुख
भारत की यह मांग 1990 के दशक से चली आ रही है। हालांकि, स्थायी सदस्यता की राह में चार मुख्य बाधाएं बनी हुई हैं:
- चीन का विरोध: बीजिंग और नई दिल्ली के बीच रणनीतिक मतभेदों के चलते चीन ने कभी भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन नहीं किया है।
- G4 बनाम UfC समूह: भारत, जर्मनी, जापान और ब्राजील (G4) स्थायी सीटों का विस्तार चाहते हैं, जबकि 'Uniting for Consensus' (UfC) समूह गैर-स्थायी सीटें बढ़ाने पर जोर दे रहा है।
- अफ्रीकी देशों की हिस्सेदारी: अफ्रीकी देशों के प्रतिनिधित्व और सीटों के स्वरूप पर अब तक सर्वसम्मति नहीं बन पाई है।
- वीटो पावर का पेंच: नए सदस्यों को वीटो का अधिकार मिलेगा या नहीं, इस पर पांचों मौजूदा स्थायी सदस्यों और दावेदारों के बीच मतभेद हैं।
UNSC में कुल 15 सदस्य होते हैं, जिनमें 5 स्थायी (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन) हैं और सभी के पास वीटो पावर है। 10 गैर-स्थायी सदस्यों को दो साल के कार्यकाल के लिए चुना जाता है। चार्टर में बदलाव के लिए महासभा में दो-तिहाई बहुमत और सभी पांचों स्थायी सदस्यों की मंजूरी अनिवार्य है।
नेहरू के समय से जुड़ा है इतिहास
आज चीन भले ही UNSC में भारत का विरोध करता हो, लेकिन 1950 के दशक में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में चीन की सदस्यता का समर्थन किया था। 1950 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अमेरिका के समक्ष चीन को सुरक्षा परिषद में शामिल करने की पैरवी की थी। हालांकि, 1955 में भारत को स्थायी सीट मिलने के प्रस्ताव को ठुकराकर चीन को देने वाले दावों को नेहरू ने संसद में खारिज कर दिया था।
