डिंडोरी जिले में शिक्षा व्यवस्था की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सरकारी दावों पर सवाल खड़े करती है। जिस जगह सरकारी राशन का भंडारण होना चाहिए, वहां पिछले दस साल से बच्चों का भविष्य गढ़ा जा रहा है। जी हां... मेहदवानी विकासखंड के मटियारी गांव में संचालित हाईस्कूल आज भी अपने भवन का इंतजार कर रहा है।  मटियारी गांव का यह हाईस्कूल... जहां नवमी और दसवीं कक्षा में करीब 60 छात्र-छात्राएं दर्ज हैं। लेकिन इन बच्चों के लिए न तो स्कूल का अपना भवन है और न ही मूलभूत सुविधाएं। हैरानी की बात यह है कि स्कूल की कक्षाएं किसी स्कूल भवन में नहीं, बल्कि सरकारी राशन दुकान की गोदाम में संचालित हो रही हैं। छोटे-छोटे कमरों में बच्चों को बैठाकर पढ़ाई कराई जा रही है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन कमरों में बच्चों की पढ़ाई किस तरह हो रही होगी। मटियारी हाईस्कूल का संचालन 1 जुलाई 2015 को शुरू हुआ था। लेकिन स्कूल शुरू होने के करीब दस साल बाद भी बच्चों को अपना भवन नसीब नहीं हुआ। यानी एक पूरी पीढ़ी इस स्कूल की बदहाल व्यवस्था के बीच पढ़ाई करने को मजबूर है। स्कूल में न तो बच्चों के लिए शौचालय की सुविधा है और न ही खेल का मैदान। सवाल यह है कि जब हाईस्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के लिए बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं, तो आखिर शिक्षा व्यवस्था के बड़े-बड़े दावों का क्या मतलब है?  एक तरफ सरकार सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ मटियारी गांव के बच्चे पिछले दस वर्षों से राशन दुकान की गोदाम में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं। वहीं जनजातीय कल्याण विभाग के अधिकारी अब जल्द स्कूल भवन निर्माण करने की बात कर रहे है। अब सवाल सीधे जिम्मेदारों से है— क्या दस साल का वक्त एक स्कूल भवन बनाने के लिए काफी नहीं था? क्या मटियारी के बच्चों को उनका अपना स्कूल भवन और बुनियादी सुविधाएं कब मिलेंगी? यह तस्वीर सिर्फ एक स्कूल की बदहाली नहीं, बल्कि उन सरकारी दावों पर भी बड़ा सवाल है, जिनमें शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की बातें की जाती हैं।