बुरहानपुर में जलझूलनी एकादशी का पर्व इस बार खास धार्मिक परंपरा के साथ मनाया गया। स्वामीनारायण मंदिर के संतों और हरिभक्तों की अगुवाई में भगवान की प्रतिमा को ताप्ती और मोहना नदी के संगम क्षेत्र ले जाया गया, जहाँ विधि-विधान के साथ नौका विहार कराया गया। बुरहानपुर प्रवास के दौरान भगवान स्वामीनारायण द्वारा नीलकंठ वर्णी के रूप में संगमेश्वर महादेव की पूजा-अर्चना करने की मान्यता है। इसी पौराणिक महत्व को केंद्र में रखते हुए इस क्षेत्र में पहली बार जलझूलनी एकादशी का यह आयोजन किया गया है।
मोहना संगम पर हुआ नौका विहार
स्वामीनारायण मंदिर के संत कोठारी पी.पी. स्वामी, चंद्रप्रकाश स्वामी शास्त्री, चिंतनप्रियदासजी शास्त्री और स्थानीय पार्षद दिनेश भगत के सानिध्य में हरिभक्त भगवान की प्रतिमा लेकर मोहना संगम पहुँचे। यहाँ पूरी धार्मिक विधि के साथ पूजा-अर्चना संपन्न हुई, जिसके बाद भगवान को नौका में विराजित कर जल विहार कराया गया।
इस दौरान संतों और हरिभक्तों ने पारंपरिक भजन-कीर्तन और रास के बीच उत्साहपूर्वक पर्व मनाया। कोठारी पी.पी. स्वामीजी की प्रेरणा से मोहना संगम पर इस परंपरा की शुरुआत की गई है। आयोजकों का कहना है कि आने वाले वर्षों में इस धार्मिक अनुष्ठान को और अधिक व्यापक और भव्य स्वरूप दिया जाएगा।
धार्मिक मान्यता और चातुर्मास का महत्व
हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल एकादशी को जलझूलनी एकादशी, परिवर्तिनी एकादशी और वामन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। चातुर्मास के दौरान भगवान के योगनिद्रा में रहने और इस तिथि पर उनके करवट बदलने की धार्मिक मान्यता है, जिस वजह से इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।
स्वामीनारायण संप्रदाय के लिए मोहना संगम के विशेष आध्यात्मिक महत्व को देखते हुए मंदिर से जुड़े हरिभक्त किशोर शाह ने बताया कि पहले आयोजन ने सभी संप्रदाय के लोगों में उत्साह भर दिया है। आगामी वर्षों में इस अनुष्ठान में बड़ी संख्या में हरिभक्तों की भागीदारी सुनिश्चित करने की तैयारी है।
