भारतीय ही नहीं विश्व की सभी संस्कृतियों में आदिकाल से गुरु यानि शिक्षक यानि टीचर का स्थान श्रेष्ठ माना गया है... उनके प्रति आदर सम्मान स्वरूप शिक्षक दिवस मनाया जाता है... ज्ञान के विस्तार की परंपरा लेकर चलने वाला शिक्षक, हर क्षण गुरु के रुप में सामने आकर अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर, ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जा रहे हैं... इस दिन शिक्षकों का सम्मान करने की परंपरा प्रचलित है... गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय,बलिहारी गुरु आपकी गोविंद दियो बताय... कबीर ने गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए उन्हें ईश्वर से भी श्रेष्ठ बताया है...क्यूंकि वे अपने शिष्यों को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा ही नहीं देते, जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए भी तैयार करते हैं... इसलिए कहा गया है कि गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः...

शिक्षक ईश्वर से भी श्रेष्ठ माना गया

हमारी संस्कृति में गुरु यानि शिक्षक को ईश्वर से भी श्रेष्ठ मानने के पीछे तर्क है कि, आध्यात्मिक ज्ञान सिर्फ उनके के माध्यम से ही प्राप्त हो सकता है... ज्ञान के सहारे लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता गुरु से होकर जाता है... इस सार्वभौम सत्य का अनुभव शिक्षक दिवस पर... गुरु के सम्मान से होता है... उनका आदर और सम्मान किसी व्यक्ति का सम्मान नहीं है, अपितु उनके देह के अंदर जो विदेही आत्मा है,परब्रह्म परमात्मा है,उसका आदर है...ज्ञान का आदर है...ज्ञान का पूजन है...ब्रह्म ज्ञान का पूजन है...गुरु अपने शिष्य को ब्रह्म निष्ठा दिलाते हैं...वे कोई व्यक्ति नहीं,जीवन का एक आदर्श बनकर आते हैं, और वह आदर्श अपने शिष्यों को सौंप कर जाते हैं...महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षक एक तत्व है...देह से भले ही वे भिन्न दिखाई देते हों,परंतु गुरु तत्व एक ही है... यह अवसर याद दिलाता है गुरु शिष्य परंपरा का... साधक का साधन से मुक्ति के सफर का...अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का, और गुरु के माध्यम से गोविंद तक पहुंचने का... गुरु ज्ञान का प्रतीक है तो गोविंद लक्ष्य का... और लक्ष्य की प्राप्ति ज्ञान के बिना असंभव है... गुरु की शरण में जाकर ही गोविंद तक पहुंचा जा सकता है... हमारी संस्कृति में यह महिमा है गुरु की,जो इस लौकिक जीवन में ही गोविंद से मिलाने की क्षमता रखता है...

शिक्षकों की भूमिका गौण होती जा रही

आज के बदलते आर्थिक और सामाजिक परिवेश में...जीवन जीने के मापदंड और मायने बदलने से माहौल में परिवर्तन आया है...स्कूल और कॉलेज केवल पाठ्यक्रम को पढ़ने और पढ़ाने तक सीमित होने,और  प्रतियोगी परीक्षाओं में अव्वल रहने की प्रतिस्पर्धा हावी होने से... शिक्षा और शिक्षकों की भूमिका गौण होती जा रही है...शॉर्टकट रास्ते से जल्द मंजिल तक पहुंचने की जद्दोजहद, और टाइम और स्पेस के इस खेल में मर्यादाओं के टूटने की विसंगतियों से...शिक्षक सीमाओं में बंधने लगे हैं, और शिष्य लक्ष्मण रेखा को तोड़ने में...जीवन की आपाधापी और कसमसाहट ने...व्यवस्थाओं की विसंगतियों को इतना जटिल बना दिया है कि...अंधकार से प्रकाश का मार्ग भी धुंधला गया है...ऐसी परिस्थियों में हमारे शिक्षक और शास्त्र ही काली घटा के अंदर दामिनी जैसा उजाला बनकर हमारे सामने आते हैं...हमारे शास्त्रों में शिक्षक होने के मानदंड बताए गए हैं...उसमें एक सैनिक जैसे अनुशासन के साथ मां के जैसा दिल भी रहता है... तभी वह अपने शिष्य के सर्वांगीण विकास में सहायक होता है...दरअसल शिक्षक का जीवन अत्यंत उज्जवल और ओजस्वी और साधनामय दृष्टिकोण होता हैं...

शिक्षक ने दिखाया सही रास्ता

व्यापक अर्थों में शिक्षक के कई मतलब निकाले जाएं,उनका आदर और सम्मान हमारी संस्कृति का हिस्सा ही नहीं,जीवन पद्धति है,जिसको लेकर हम वैदिक काल से आज तक इस परंपरा को निभाते चले आ रहे हैं... हमारी शिक्षा और ज्ञान गुरु-शिष्य संवाद के रूप में सामने आता है। जैसे कृष्ण-अर्जुन संवाद,यम-नचिकेता संवाद,जनक-अष्टावक्र संवाद,जनक-याज्ञवल्क्य संवाद...हमारे यहां एक लंबी परंपरा रही है शिक्षा और ज्ञान के विस्तार की... गुरु वशिष्ठ,विश्वामित्र ही नहीं,भगवान महावीर,गौतम बुद्ध,गुरु नानक,ऋषियों मुनियों,सूफी संतों और महंतों ने तत्व ज्ञान के रहस्यों को, सहज और सरल भाव से व्यक्त किया...उन्होंने जीवन में क्या करना चाहिए, और क्या नहीं करना चाहिए, तक ही अपनी बात को सीमित नहीं रखा,अविवेक से विवेक की ओर जाने का रास्ता भी दिखलाया...इसी रास्ते से होकर नरेन्द्र ने विवेकानंद तक का सफर तय किया...जीवन में विवेकपूर्ण कार्य और व्यवहार से आनंद कैसे प्राप्त किया जा सकता है...यह जानने की अभिलाषा ही शिक्षक दिवस के दिन शिक्षक के पास ले जाती है...जहां शिक्षक का आदर और सम्मान करके, हम अपने लक्ष्य की ओर एक कदम आगे बढ़ते हैं। 

विचार से व्यवहार लाने की परंपरा

हम जब हुए शाहबाज तोड़कर गए आकाश,वहां कुछ न देखिया,जो देखिया गुरु के पास...गुरु को धोबी के समान माना गया है...तभी तो कहा गया है,मुर्शिद ऐसा चाहिए जैसे धोबी होय,देवे साबुन ज्ञान का दाग धब्बे सब धोय...शिक्षक अपने शिष्य का सबसे बड़ा हितैषी होता है...उसकी सफलता में ही शिक्षक की सफलता मानी जाती है... इसीलिए माता पिता के बाद शिक्षक को स्थान दिया गया है...केवल उसी में क्षमता है अपने शिष्य के सर्वांगीण विकास की...जीवन के हर मोड़ पर शिक्षक का हर उपदेश प्रेरणा देता है...सफलता का रास्ता भी उनके सानिध्य से ही होकर निकलता है...उल्लास और आनंद भी यहीं से मिलता है...विचार को व्यवहार में लाने की कला उन्हीं से ही मिलती है...द्वंद्व की स्थिति में विवेक का संचार भी यहीं से होता है...

शिष्य को स्वरुप प्रदान करता शिक्षक

मुंडक श्रुति में उल्लेखित साधना और प्रवृतियां हमारे जीवन का एक सिद्धांत है...ब्रह्म ही हमारा लक्ष्य है...इसको प्राप्त करने के लिए एक अत्यंत औजस्वी साधन की जरुरत है...उस साधन को एक सिद्धांत के द्वारा प्राप्त करते हैं...इसके द्वारा चैतन्य स्तर को उन्नत करते है...तब जीवन में उन्नति होती है...समाज बदल रहा है,शिक्षा का माहौल बदल रहा है... सदियों से शिक्षा के विस्तारक शिक्षक का सम्मान होता आया है... वह अपने शिष्य को शिक्षित ही नहीं करता, अपना स्वरुप भी प्रदान करता है... इसीलिए भारतीय संस्कृति में गुरु, शिक्षक या टीचर, इन सभी  का स्थान महत्वपूर्ण माना गया है... क्यूंकि वह गोविंद से मिलाने का माद्दा रखता है... यानी एक शिक्षक, अपने स्वरुप को अपने शिष्य में स्थापित कर, उसे जीवन की हर मुसीबतों से छुटकारा पाने के लिए तैयार करता है, मजबूत करता है।

लिहाजा शिक्षक दिवस कोई साधारण दिन नहीं, अपितु विशेष अवसर होता है, जहां शिक्षक और शिष्य की मर्यादाओं और परंपराओं के भीतर रहते हुए ,आत्मिक उन्नति की ओर जाने के लिए रेशम सा महीन और मजबूत धागे से रक्षा सूत्र बंधने जैसा महसूस होता है...देश, काल परिस्थियां भले ही बदलती रहे, लेकिन इन दोनों का यह संबंध और रिश्ता, हमेशा से रेशम के धागे की तरह मजबूत रहा है...इसमें जोश, जज्बा और जुनून के साथ धैर्य, संयम और साहस का भी अहसास होता है...