कोटा के विज्ञान नगर थाना क्षेत्र में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान एक बड़ा हादसा सामने आया है। संजय नगर के सात बच्चे प्रतिमा विसर्जन के लिए चंबल नदी की दाईं मुख्य नहर पर गए थे, जहां संतुलन बिगड़ने से नाव पलट गई और सभी पानी में डूब गए। आसपास के लोगों ने तीन बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया, जबकि चार बच्चे पानी में बह गए। घटना के बाद चलाए गए तलाशी अभियान के बाद चारों बच्चों के शव बरामद कर लिए गए हैं।
जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक मौके पर पहुंचे थे, लेकिन बच्चों को बचाया नहीं जा सका। इस दुर्घटना ने एक बार फिर प्रशासनिक सुरक्षा व्यवस्था और विसर्जन के तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अनाधिकृत स्थान पर हुआ हादसा
यह दुर्घटना जिस जगह पर हुई, वहां नगर निगम द्वारा मूर्ति विसर्जन के लिए कोई आधिकारिक पॉइंट या व्यवस्था तय नहीं की गई थी। नगर निगम के गोताखोर और रेस्क्यू टीम के सदस्य प्रशासन द्वारा तय किए गए छह प्रमुख विसर्जन स्थलों पर तैनात थे।
इनमें रंगपुर घाट, नयापुरा छोटी पुलिया, गोविंद धाम, भीतरिया कुंड (चंबल नदी), बारहद्वारी (किशोर सागर तालाब) और कंसुआ घाट शामिल हैं। इन सभी जगहों पर केशवरायपाटन से मंगवाई गई बड़ी लकड़ी की नावें और दो रेस्क्यू मोटर बोट तैनात थीं। घटना की सूचना मिलते ही किशोर सागर तालाब पर तैनात गोताखोर चंगेज खान की टीम अपना पॉइंट छोड़कर मौके पर पहुँची और स्कूबा डाइविंग के जरिए तलाशी अभियान शुरू किया।
2013 से शुरू हुई थी विसर्जन व्यवस्था की रूपरेखा
गोताखोर और रेस्क्यूअर विष्णु धर श्रृंगी के अनुसार, इस तरह की औपचारिक व्यवस्था वर्ष 2013 में भीतरिया कुंड पर एक व्यक्ति की डूबने से हुई मौत के बाद शुरू हुई थी। उस रात हंगामे के बाद नगर निगम ने भीतरिया कुंड पर बड़ी नावों के जरिए विसर्जन शुरू किया, जो धीरे-धीरे बढ़कर छह प्रमुख स्थानों तक पहुँचा। सीमित संसाधनों और मैनपावर के बीच इन सभी स्थानों पर सुरक्षा संभालना एक बड़ी चुनौती रहता है।
सुरक्षा को लेकर सामने आए अहम सुझाव
इस दर्दनाक घटना के बाद स्थानीय स्तर पर कुछ जरूरी सुधारों की मांग की जा रही है, जिन पर प्रशासन और आमजन दोनों को विचार करने की आवश्यकता है:
- विसर्जन के लिए तय हो निश्चित दिन: वर्तमान में अष्टमी, नवमी और विजयादशमी पर अलग-अलग विसर्जन होने से पुलिस और प्रशासनिक अमले पर एक साथ भारी दबाव बनता है। गणेश विसर्जन की तरह इसके लिए भी एक या दो तय तारीखें होनी चाहिए।
- असुरक्षित और अवैध कश्तियों पर रोक: मछली पकड़ने वाली छोटी और अस्थिर नाविकों पर प्रतिमाएं ले जाने से संतुलन बिगड़ता है। विसर्जन के लिए केवल प्रशासन द्वारा स्वीकृत और पर्याप्त क्षमता वाली स्थिर नावें ही इस्तेमाल होनी चाहिए।
- नहर के पानी के बहाव पर नियंत्रण: बड़े आयोजनों के दौरान जल प्रबंधन विभाग से समन्वय करके नहर का जलप्रवाह नियंत्रित किया जाना चाहिए ताकि आपात स्थिति में रेस्क्यू कार्य तेजी से हो सके।
- सुरक्षा दीवारों की ऊँचाई: नहरों के किनारे पर्याप्त ऊँचाई की दीवारें और चेतावनी संकेत होने चाहिए ताकि भीड़ के दौरान लोग अनजाने में पानी में न गिर सकें।
प्रशासन और गोताखोर टीम की अपील है कि आस्था के इन पर्वों पर सुरक्षा नियमों का पालन कड़ाई से किया जाए और केवल निर्धारित तथा सुरक्षित विसर्जन स्थलों का ही उपयोग हो। कोटा न्यूज़ के इस मामले में प्रशासनिक और स्थानीय स्तर पर सुरक्षा इंतजामों को लेकर समीक्षा की जा रही है।
