Thursday, 1 October 2026
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प्रसिद्ध राजस्थानी गीतकार दुर्गादान सिंह गौड़ का निधन, 'हाड़ौती के कालिदास' ने 80 वर्ष की उम्र में कोटा में ली अंतिम सांस

संक्षेप में

राजस्थानी भाषा के प्रसिद्ध गीतकार और कवि दुर्गादान सिंह गौड़ का 80 वर्ष की उम्र में रविवार शाम कोटा के निजी अस्पताल में निधन हो गया। वे 'हाड़ौती के कालिदास' के नाम से लोकप्रिय थे और उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव जोलपा में किया गया।

मुख्य बातें

  • दुर्गादान सिंह गौड़ का रविवार शाम कोटा में निधन हो गया.
  • वे 80 वर्ष के थे और लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे.
  • उनका अंतिम संस्कार झालावाड़ के जोलपा गांव में सोमवार को हुआ.
  • वे
  • उनकी चर्चित पुस्तक
कोटा संभाग
प्रसिद्ध राजस्थानी गीतकार दुर्गादान सिंह गौड़ का निधन, 'हाड़ौती के कालिदास' ने 80 वर्ष की उम्र में कोटा में ली अंतिम सांस

राजस्थानी भाषा के प्रख्यात गीतकार और कवि दुर्गादान सिंह गौड़ का रविवार शाम को कोटा के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वे 80 वर्ष के थे और लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन की खबर सामने आने के बाद प्रदेश के साहित्यिक और सांस्कृतिक हलकों में शोक छा गया।

झालावाड़ जिले की खानपुर तहसील के जोलपा गांव के मूल निवासी दुर्गादान सिंह गौड़ ने रविवार शाम करीब साढ़े चार बजे अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार सोमवार दोपहर करीब एक बजे उनके पैतृक गांव जोलपा में किया गया, जहां बड़ी संख्या में साहित्यकार और ग्रामीण अंतिम विदाई देने पहुंचे। वे अपने पीछे चार बेटे और दो बेटियों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं।

'हाड़ौती के कालिदास' के रूप में थी पहचान

साहित्य जगत में उन्हें 'हाड़ौती के कालिदास' और राजस्थानी भाषा के 'गीत ऋषि' के रूप में जाना जाता था। उनके गीतों की मिठास और लोकजीवन से जुड़ाव ने उन्हें खास पहचान दिलाई थी। 1960 के दशक के अकाल पर लिखा उनका गीत 'हिवड़ो जले, म्हारो जियरो बले, धरती थारा जाया लाल भूखा क्यों मरै' काफी लोकप्रिय हुआ था। इसके अलावा 'मद्गाल्यो मोरयो', 'तू कतनी खूब चले छै' और 'न्हाती धोती नतरती दैखी' जैसे उनके गीत पीढ़ियों से लोगों की जुबान पर रहे हैं।

राजनीतिक और साहित्यिक हस्तियों ने दी श्रद्धांजलि

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि उनके निधन से प्रदेश के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक जगत को गहरा आघात पहुंचा है। उन्होंने कहा कि हाड़ौती के कालिदास के रूप में अपनी अलग पहचान बनाने वाले गौड़ ने अपनी रचनाओं से राजस्थानी साहित्य को समृद्ध किया है।

प्रसिद्ध कवि कुमार विश्वास ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए 'हाड़ौती की वीणा' और 'लोकभाषा के कालिदास' बताया है।

साहित्यिक योगदान और प्रकाशित कृतियां

अपने लंबे साहित्यिक सफर में दुर्गादान सिंह गौड़ ने राजस्थानी भाषा और संस्कृति को समृद्ध करने में अहम भूमिका निभाई। उनकी चर्चित पुस्तक 'पाणी में चांद घुले' पहले ही प्रकाशित हो चुकी थी, जबकि 'राधे-राधे' और 'रेखाचित्र' नाम से दो और पुस्तकें जल्द प्रकाशित होने वाली थीं। उनके निधन को राजस्थानी शृंगार गीतों और लोककाव्य के एक गौरवशाली युग का अंत माना जा रहा है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

दुर्गादान सिंह गौड़ कौन थे?

दुर्गादान सिंह गौड़ राजस्थानी भाषा के प्रख्यात गीतकार, कवि और लेखक थे, जिन्हें 'हाड़ौती के कालिदास' और 'गीत ऋषि' के रूप में जाना जाता था।

दुर्गादान सिंह गौड़ का निधन कब और कहाँ हुआ?

उनका निधन रविवार शाम करीब साढ़े चार बजे कोटा के एक निजी अस्पताल में हुआ। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे।

उनका अंतिम संस्कार कहाँ किया गया?

उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव जोलपा (खानपुर तहसील, झालावाड़ जिला) में सोमवार दोपहर करीब एक बजे किया गया।

दुर्गादान सिंह गौड़ के कौन-से गीत सबसे प्रसिद्ध थे?

उनका 1960 के दशक के अकाल पर लिखा गीत 'हिवड़ो जले, म्हारो जियरो बले' तथा 'मद्गाल्यो मोरयो' और 'तू कतनी खूब चले छै' जैसे गीत बेहद प्रसिद्ध रहे।