मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में 'राजस्थान यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) विधेयक-2026' के प्रारूप को मंजूरी दे दी गई है। इस विधेयक का उद्देश्य राज्य में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, भरण-पोषण और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े कानूनों को एक समान और पारदर्शी ढांचा देना है।

प्रेसवार्ता में संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल ने बताया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 की भावना के अनुरूप तैयार इस विधेयक को विधानसभा के आगामी सत्र में पेश किया जाएगा। उच्चतम न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर यह प्रारूप तैयार किया गया है। हालांकि, इसके प्रावधान अनुसूचित जनजातियों और संविधान के तहत संरक्षित पारंपरिक अधिकारों वाले वर्गों पर लागू नहीं होंगे।

विवाह पंजीकरण और लिव-इन रिलेशनशिप पर नए नियम

नए विधेयक के तहत सभी धर्मों और समुदायों को अपनी परंपराओं और रीतियों (जैसे सप्तपदी, निकाह, आनंद कारज, होली यूनियन आदि) के अनुसार विवाह संपन्न कराने की पूरी छूट दी गई है, लेकिन कानून लागू होने के बाद होने वाले सभी विवाहों का 60 दिनों के भीतर पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। साथ ही, बहुविवाह पर रोक लगाई गई है।

लिव-इन संबंधों के मामले में भी सख्त नियम तय किए गए हैं। इसके तहत संबंधों की शुरुआत और समापन की लिखित सूचना या पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा, जिससे दोनों पक्षों के कानूनी अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। पंजीकरण न कराने पर विवाह अमान्य तो नहीं होगा, लेकिन 10 हजार रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। वहीं, नोटिस मिलने के बाद भी अनदेखी करने पर यह जुर्माना 25 हजार रुपए तक हो सकता है।

उत्तराधिकार और संपत्ति के अधिकार

उत्तराधिकार के मामलों में पुत्र और पुत्री को पूरी तरह समान अधिकार दिए गए हैं। यदि कोई व्यक्ति बिना वसीयत बनाए मृत होता है, तो संपत्ति के हस्तांतरण के लिए तीन प्राथमिकता श्रेणियां तय की गई हैं।

पहली श्रेणी में जीवित पति या पत्नी, बच्चे, मृत बच्चों के परिजन और माता-पिता को रखा गया है। दूसरी श्रेणी में सौतेले माता-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी और नाना-नानी शामिल हैं। तीसरी श्रेणी में अन्य रिश्तेदारों को जगह मिली है। यदि इन श्रेणियों में कोई कानूनी उत्तराधिकारी नहीं मिलता है, तो संपत्ति सरकार के पास जाएगी, जो उसकी देनदारियों के अधीन होगी। इसके अलावा, मृत्यु के समय गर्भ में मौजूद शिशु (जो बाद में जीवित जन्मा हो) को भी उत्तराधिकार का पूरा कानूनी हक मिलेगा।

विवादों का निपटारा और समयासीमा

विवाह के बाद उत्पन्न होने वाले विवादों के निपटारे के लिए स्पष्ट न्यायिक प्रक्रिया तय की गई है। नियमों के उल्लंघन, जबरन या धोखे से सहमति लेने, या नपुंसकता जैसे आधारों पर न्यायालय द्वारा विवाह को शून्य घोषित किया जा सकेगा।

विवाह या तलाक के पंजीकरण का आवेदन मिलने के 15 दिनों के भीतर रजिस्ट्रार को प्रमाण पत्र जारी करना होगा या कारण बताते हुए आवेदन खारिज करना होगा। आवेदन खारिज होने की स्थिति में 30 दिनों के भीतर रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष अपील की जा सकेगी, जिसका निस्तारण 60 दिनों के भीतर करना अनिवार्य होगा। जानबूझकर प्रक्रिया में देरी करने वाले रजिस्ट्रार पर 25 हजार रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।