दिल क्या है...शरीर का एक भाग या फिर भावनाओं का समंदर...अगर यह शरीर का केवल एक हिस्सा है तो जीव विज्ञानी इसे आसानी से,जीव शास्त्र की परिभाषाओं में गढ़ कर समझा सकते हैं...और यदि भावनाओं का समंदर है,तो फिर इसकी गहराइयों में डूब कर गोते लगाते रहिए,कुछ हासिल नहीं होगा...अगर होगा तो सिर्फ उसके आसपास का ही नजरिया,वह भी साफ साफ नहीं,हल्का धुंधला सा ही समझ में आ पाएगा...ढ़ाई आखर प्रेम का पढ़ने वाला पंडित भी इसके बारे में न तो समझ पाए,और न ही यह समझा पाए,कि दिल चीज क्या है,आप मेरी जान लीजिए...बस,एक बार मेरा कहा मान लीजिए...माना है किसी ने...
भावनाओं का सम्मान जरुरी
जीवन में बुद्धि यानी अक्ल और भावना यानी दिल,अलग-अलग रास्ते दिखाएं और दोनों अपनी-अपनी बात कहें,तब अमूमन बुद्धि की बात सुनी जाती है...निर्णय लेते समय दिल की भावनाओं का भी सम्मान किया जाता है...खुमार बाराबंकवी अपनी एक गजल में इस विचार को यूं बयां करते है कि,अक़्ल ओ दिल अपनी अपनी कहें जब ख़ुमार,अक़्ल की सुनिए दिल का कहा कीजिए...किया है किसी ने...कभी कभी सोच समझकर ही नहीं,भूल से भी दिल कहीं लग जाता है,या फिर जाने अनजाने में कहीं लगा दिया जाता है,तो साहिर लुधियानवी दिल को नादां और बेचारा बताते हुए कह देते हैं कि, भूले से मोहब्बत कर बैठा नादां था बेचारा दिल ही तो है...और जब किसी को दिया हुआ दिल वापस मांग लिया जाता है, तो जवाब में हकीम नासिर ने कह देते हैं कि,जो दिल मांगा तो वो बोले की ठहरो याद करने दो,जरा सी चीज थी खुदा जाने कहां रख दी...
मोबाइल क्रांति ने दिल को कही ना का नहीं छोड़ा
संचार सुविधाओं के विस्तार में मोबाइल क्रांति ने दिल को कहीं का नहीं छोड़ा...इस दिल के टुकड़े हजार हुए,कोई इधर गिरा कोई उधर गिरा...और यह सब होता है गलतफहमियों,मतभेद और मनभेद के कारण...खासकर सोशल मीडिया के इस दौर में...और वह भी उन किरदारों के साथ, जो इन प्लेटफॉर्म पर लाखों लोगों के साथ रहते हैं, खुशियां मनाते हैं, उनके साथ होने का दंभ भरते हैं...समाज में खुद को दूसरों से अलहदा समझते हुए आभाषी दुनिया का सरताज समझते है...हकीकत यह भी है कि, ऐसे लोग तिलिस्माई चकाचौंध से भरी इस आभाषी दुनिया को अपनी मुट्ठी में कैद कर, खंडहर सी जिंदगी को सपनों के महलों में रहने का ख्वाब पाल रहे हैं...जिनका हकीकत से दूर दूर तक वास्ता नहीं होता...
चर्चा और बहस का मुद्दा
मध्यप्रदेश से आई एक खबर ने दिल के मसले को चर्चा और बहस का मुद्दा बना दिया...क्या किसी का दिल आधा अधूरा होता है...होता है तो कैसा लगता है...और अगर नहीं तो पूरा दिल कैसा होता है...इस फानी दुनिया से जाते समय क्या वो पूरा दिल इस बात की गवाही देता कि वह आधा अधूरा है या पूरा... शून्य अवस्था में कोई संवाद नहीं होता...न तो दिल की आवाज सुनाई देती है और न दिमाग की...फिर यह कैसे तय कर लिया जाता है कि मेरा दिल आधा अधूरा है या पूरा...ईश्वर ने तो एक शरीर दिया जिसमें एक दिल भी होता है, जो पूरा एक ही होता है...तो फिर उसे बांट कौन देता है...आधा अधूरा कर देता है...कहा गया है कि आईने के सौ टुकड़े हमने करके देखे हैं, एक भी तन्हा थे सौ में भी अकेले हैं...यह है सोशल मीडिया की एक हकीकत...जो मध्यप्रदेश से आई एक खबर से साबित होती है, जिसमें एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अपने आधे अधुरे दिल का फसाना साथ लेकर इस दुनिया को अलविदा कर दिया...
सोशल मीडिया के सुनहरे आयामों के बीच एक धुंधला सा आवरण उसके आगे लहराता है...उसके पीछे की काली छाया सांय सांय कर डराती है, सहमाती है, एक खबर भले ही सुर्खियां बनी हो कुछ समय के लिए, कुछ घंटों, दिनों या फिर एक काल अवधि के लिए...घटना एक है, लेकिन इसके मायने बहुत...मतलब कई निकलते हैं...व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और नैतिक आधार पर चर्चा और बहस हो सकती है, लेकिन समस्या वहीं की वहीं खड़ी है...सवाल गंभीर है, समाधान उतना सहज और सरल नहीं है...जिदंगी जीने की कशमकश में दिलों की उलझनें बढ़ती हैं,घटती हैं,गलतफहमियां और मनभेद कम होते हैं,नहीं भी होते हैं...लेकिन जब तक आपस में बैठकर बातचीत या सलाह मशविरा नहीं किया जाता,यूं ही आवारगी और दीवानगी बढ़ती रहती है,कम होती रहती है...मतलब साफ है रिश्तों की कशमकश और दूरियों को मिटाने के लिए संवाद, यानी बातचीत बहुत जरूरी है...हफ़ीज़ होशियारपुरी इस तरफ इशारा करते हुए कहते भी है कि, दिलों की उलझनें बढ़ती रहेंगी,अगर कुछ मशवरे बाहम न होंगे...साहित्यकार उदय प्रताप सिंह ने भी लिखा कि सब फैसले होते नहीं सिक्का उछाल के,ये दिल का मामला है जरा देखभाल के...मोबाइलों के दौर के आशिक को क्या पता,रखते थे कैसे खत में कलेजा निकाल के...ये कहके नई रोशनी रोएगी एक दिन,अच्छे थे वही लोग पुराने ख्याल के...किसी ने सोचा है इसके बारे में...
