दिल्ली में हुई एक मुलाकात के बाद बदला बंगाल का राजनीतिक समीकरण, विधानसभा में नए गुट को मिली मान्यता

मुख्य बिंदु

  • तृणमूल कांग्रेस के 60 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बगावत की
  • विधायक रीताब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बना नया गुट
  • दिल्ली के बंगाल भवन में हुई मुलाकात को माना जा रहा घटनाक्रम का टर्निंग पॉइंट
  • टीएमसी के 28 साल के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी टूट

खबर

कोलकाता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। लंबे समय से राज्य की प्रमुख राजनीतिक ताकत रही तृणमूल कांग्रेस (TMC) अब अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट का सामना कर रही है। पार्टी के 28 साल के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी बगावत सामने आई है, जहां 80 में से 60 विधायकों ने अलग होकर नया गुट बना लिया है।

इस बगावत का नेतृत्व उलूबेरिया पूर्व से विधायक रीताब्रत बनर्जी कर रहे हैं। विधानसभा में उनके नेतृत्व वाले गुट को मान्यता भी मिल चुकी है, जिससे राज्य की राजनीति में नया समीकरण बन गया है।

दिल्ली की मुलाकात बनी सियासी तूफान की वजह

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत दिल्ली स्थित बंगाल भवन में हुई एक मुलाकात से हुई। बताया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी और टीएमसी विधायक रीताब्रत बनर्जी के बीच हुई यह बैठक शुरुआत में सामान्य और औपचारिक मुलाकात मानी गई थी।

हालांकि राजनीतिक गलियारों में इस मुलाकात को लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। रीताब्रत बनर्जी ने भी इसे महज कुछ मिनटों की शिष्टाचार भेंट बताया था, लेकिन अगले कुछ दिनों में हालात तेजी से बदल गए।

13 दिनों में खुलकर सामने आ गई बगावत

बताया जा रहा है कि इस मुलाकात के बाद महज 13 दिनों के भीतर टीएमसी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आ गया। बड़ी संख्या में विधायकों ने पार्टी के मौजूदा नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए अलग गुट बनाने का फैसला किया और विधानसभा में अपने विधायी दल पर दावा पेश कर दिया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है। राज्य में सत्ता संतुलन और विपक्ष की रणनीति पर भी इसका सीधा असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

बंगाल की राजनीति में नया अध्याय

टीएमसी की स्थापना के बाद से यह पहली बार है जब पार्टी इतने बड़े स्तर पर विभाजन का सामना कर रही है। 60 विधायकों के अलग होने से न केवल पार्टी की संगठनात्मक ताकत प्रभावित हुई है, बल्कि आने वाले समय में पश्चिम बंगाल की राजनीति में नए गठबंधनों और समीकरणों के बनने की संभावना भी बढ़ गई है।

अब सभी की नजर इस बात पर है कि ममता बनर्जी और पार्टी नेतृत्व इस संकट से कैसे निपटते हैं और क्या बागी विधायकों को वापस साथ लाने की कोई कोशिश की जाती है।