उज्जैन में विजयादशमी के पावन पर्व पर भगवान श्री महाकालेश्वर की पारंपरिक सवारी पूरे वैभव के साथ निकाली गई। इस वर्ष के आयोजन में पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ मध्य प्रदेश की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और आधुनिक सांस्कृतिक झांकियों का अनूठा संगम देखने को मिला। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर इस बार की सवारी में कई नए आकर्षण जोड़े गए थे, जिसने शहरवासियों और दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालुओं का मन मोह लिया।
सभा मंडप से रवाना हुई पालकी, पुलिस बल ने दी सलामी
शाम चार बजे महाकाल मंदिर के सभा मंडप में भगवान श्री मनमहेश का विधिवत पूजन-अर्चन किया गया, जिसके बाद सवारी को गंतव्य के लिए रवाना किया गया। मंदिर परिसर से निकलते ही मध्य प्रदेश सशस्त्र पुलिस बल और श्री महाकालेश्वर मंदिर के बैंड ने पालकी को गार्ड ऑफ ऑनर और सलामी दी।
सवारी पारंपरिक मार्ग से होते हुए आगे बढ़ी। गुदरी चौराहा, पटनी बाजार, गोपाल मंदिर, सराफा, सतीगेट और देवासगेट से गुजरती हुई पालकी टॉवर चौराहा पहुंची, जहाँ से वह दशहरा मैदान की ओर बढ़ी। इस दौरान मार्ग में जगह-जगह श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।
दशहरा मैदान पर हुआ शमी पूजन, मंत्रियों और अधिकारियों की मौजूदगी
दशहरा मैदान पहुँचने पर कलेक्टर रोशन कुमार सिंह और पुलिस अधीक्षक प्रदीप शर्मा ने भगवान मनमहेश और शमी वृक्ष की पूजा-अर्चना की। परंपरा के अनुसार यहाँ शस्त्र पूजन और विजयादशमी के अन्य अनुष्ठान संपन्न हुए।
चामुंडा माता चौराहे से गुजरते समय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के परिजनों ने पुष्पवर्षा कर भगवान महाकाल की सवारी का स्वागत किया। सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए जिला प्रशासन ने पूरे मार्ग पर चाक-चौबंद इंतजाम किए थे, जिसमें पुलिस बल के अलावा चिकित्सा, सफाई और प्रकाश की विशेष व्यवस्थाएं शामिल थीं।
लोकनृत्य और वैदिक मंत्रोच्चार बना आकर्षण का केंद्र
इस बार की सवारी में मालवा-निमाड़ और अंचल के विभिन्न जिलों से आए कलाकारों ने समां बांध दिया। रतलाम, धार, देवास और झाबुआ से पहुँचे करीब 250 जनजातीय कलाकारों ने पारंपरिक वेशभूषा में लोकनृत्यों की प्रस्तुतियां दीं।
इसके साथ ही, 300 वैदिक बटुकों ने समवेत स्वर में वैदिक मंत्रों का उद्घोष करते हुए पालकी यात्रा की अगुवाई की। सवारी मार्ग पर एक लाख वर्गफीट से अधिक क्षेत्रफल में भव्य रंगोलियां सजाई गईं। 84 महादेव की झांकी, लाइव पेंटिंग प्रदर्शन, 10 भजन मंडलियों की प्रस्तुतियां और पाँच एलईडी रथ इस आयोजन के मुख्य आकर्षण रहे। पालकी पर आसमान से ड्रोन के जरिए 500 किलोग्राम से अधिक फूलों की पंखुड़ियों की वर्षा की गई।
महाकाल मंदिर में हुआ ध्वज परिवर्तन, भक्तों को मिले होल्कर मुखारविंद के दर्शन
दशहरा मैदान पर पूजन और अनुष्ठान संपन्न होने के बाद बाबा महाकाल की सवारी अपने निर्धारित वापसी मार्ग से पुनः श्री महाकालेश्वर मंदिर लौटी। मंदिर पहुँचने पर गर्भगृह में संध्या आरती और विधिवत पूजा-अर्चना के साथ सवारी का समापन किया गया।
इस अवसर पर मंदिर के शिखर पर ध्वज परिवर्तन की प्राचीन परंपरा निभाई गई। संध्या पूजन के बाद मंदिर के कपाट खुलने पर श्रद्धालुओं को भगवान महाकाल के श्री होल्कर मुखारविंद के दुर्लभ दर्शन लाभ प्राप्त हुए, जिसके बाद भगवान को नवीन वस्त्र धारण कराए गए।
