मध्य प्रदेश के रतलाम शहर में स्थित श्री महालक्ष्मी मंदिर अपनी अनूठी परंपरा के लिए देश भर में जाना जाता है। माणक चौक पर स्थित इस मंदिर में दीपावली के अवसर पर माता महालक्ष्मी का श्रृंगार फूलों से नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये की नकदी, सोने-चांदी के आभूषणों और बेशकीमती रत्नों से किया जाता है। दीपोत्सव के पांच दिनों तक यहां आस्था और वैभव का ऐसा संगम देखने को मिलता है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
रियासत काल से जुड़ी है परंपरा
मंदिर से जुड़े इतिहास के मुताबिक, यह परंपरा करीब 300 से 400 साल पुरानी है। इसकी शुरुआत रतलाम रियासत के संस्थापक महाराजा रतन सिंह राठौर के शासनकाल में हुई थी।
धनतेरस और दीपावली के मौके पर राजवंश के लोग माता के चरणों में अपना खजाना अर्पित करते थे और राज्य में सुख-समृद्धि की कामना करते थे। वक्त के साथ यह परंपरा राजमहल से निकलकर आम जनमानस की आस्था से जुड़ गई। आज भी धनतेरस से लेकर भाईदूज तक भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार मां के दरबार में नकदी और कीमती गहने जमा कराते हैं।
कुबेर की पोटली और हिसाब-किताब
दीपोत्सव के दौरान मंदिर परिसर को भव्य तरीके से सजाया जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में 'कुबेर की पोटली' दी जाती है, जिसमें श्रीफल के साथ सोने-चांदी के सिक्के और आभूषण शामिल होते हैं। भक्तों का मानना है कि यह प्रसाद घर में बरकत और सौभाग्य लेकर आता है।
इस पूरी प्रक्रिया की सबसे खास बात इसकी पारदर्शिता है। भक्त जो भी नकदी और जेवर मां के चरणों में अर्पित करते हैं, उसका बाकायदा लेखा-जोखा रखा जाता है। दीपोत्सव के अनुष्ठान संपन्न होने के बाद मंदिर समिति की तरफ से वह सारी संपत्ति संबंधित श्रद्धालुओं को वापस लौटा दी जाती है।
