Friday, 6 November 2026
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रतलाम का महालक्ष्मी मंदिर: जहां 300 साल पुरानी परंपरा के तहत करोड़ों की नकदी और गहनों से होता है मां का श्रृंगार

संक्षेप में

रतलाम के माणक चौक स्थित महालक्ष्मी मंदिर में 300 साल पुरानी परंपरा के तहत दीपावली पर मां का श्रृंगार फूलों की बजाय करोड़ों की नकदी और सोने-चांदी के गहनों से किया जाता है, जिसे बाद में श्रद्धालुओं को लौटा दिया जाता है।

मुख्य बातें

  • मंदिर की परंपरा 300 से 400 साल पुरानी है.
  • इसकी शुरुआत रतलाम रियासत के संस्थापक महाराजा रतन सिंह राठौर के समय हुई थी.
  • दीपोत्सव के बाद श्रद्धालुओं को उनकी अर्पित की गई नकदी और जेवर वापस लौटा दिए जाते हैं.
मध्य प्रदेश
रतलाम का महालक्ष्मी मंदिर: जहां 300 साल पुरानी परंपरा के तहत करोड़ों की नकदी और गहनों से होता है मां का श्रृंगार

मध्य प्रदेश के रतलाम शहर में स्थित श्री महालक्ष्मी मंदिर अपनी अनूठी परंपरा के लिए देश भर में जाना जाता है। माणक चौक पर स्थित इस मंदिर में दीपावली के अवसर पर माता महालक्ष्मी का श्रृंगार फूलों से नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये की नकदी, सोने-चांदी के आभूषणों और बेशकीमती रत्नों से किया जाता है। दीपोत्सव के पांच दिनों तक यहां आस्था और वैभव का ऐसा संगम देखने को मिलता है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

रियासत काल से जुड़ी है परंपरा

मंदिर से जुड़े इतिहास के मुताबिक, यह परंपरा करीब 300 से 400 साल पुरानी है। इसकी शुरुआत रतलाम रियासत के संस्थापक महाराजा रतन सिंह राठौर के शासनकाल में हुई थी।

धनतेरस और दीपावली के मौके पर राजवंश के लोग माता के चरणों में अपना खजाना अर्पित करते थे और राज्य में सुख-समृद्धि की कामना करते थे। वक्त के साथ यह परंपरा राजमहल से निकलकर आम जनमानस की आस्था से जुड़ गई। आज भी धनतेरस से लेकर भाईदूज तक भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार मां के दरबार में नकदी और कीमती गहने जमा कराते हैं।

कुबेर की पोटली और हिसाब-किताब

दीपोत्सव के दौरान मंदिर परिसर को भव्य तरीके से सजाया जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में 'कुबेर की पोटली' दी जाती है, जिसमें श्रीफल के साथ सोने-चांदी के सिक्के और आभूषण शामिल होते हैं। भक्तों का मानना है कि यह प्रसाद घर में बरकत और सौभाग्य लेकर आता है।

इस पूरी प्रक्रिया की सबसे खास बात इसकी पारदर्शिता है। भक्त जो भी नकदी और जेवर मां के चरणों में अर्पित करते हैं, उसका बाकायदा लेखा-जोखा रखा जाता है। दीपोत्सव के अनुष्ठान संपन्न होने के बाद मंदिर समिति की तरफ से वह सारी संपत्ति संबंधित श्रद्धालुओं को वापस लौटा दी जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

रतलाम के महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली पर क्या अनूठी परंपरा है?

रतलाम के माणक चौक स्थित श्री महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली के पांच दिनों तक मां का श्रृंगार फूलों की बजाय करोड़ों रुपये की नकदी, सोने-चांदी के आभूषणों और बेशकीमती रत्नों से किया जाता है।

यह परंपरा कितनी पुरानी है और इसकी शुरुआत किसने की थी?

यह परंपरा करीब 300 से 400 साल पुरानी है, जिसकी शुरुआत रतलाम रियासत के संस्थापक महाराजा रतन सिंह राठौर के शासनकाल में हुई थी।

त्योहार के बाद श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित की गई नकदी और गहनों का क्या होता है?

भक्तों द्वारा अर्पित की जाने वाली हर एक वस्तु का पूरा हिसाब रखा जाता है और दीपोत्सव के समापन के बाद वह संपत्ति संबंधित श्रद्धालुओं को वापस लौटा दी जाती है।

मंदिर से मिलने वाली

श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में दी जाने वाली कुबेर की पोटली में श्रीफल के साथ सोने-चांदी के सिक्के और आभूषण होते हैं, जिसे सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।