इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल आर्य समाज मंदिर द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र से यह साबित नहीं होता कि शादी हिंदू विवाह अधिनियम के तहत वैध है। अदालत ने कहा कि कानूनी रूप से वैध विवाह के लिए सप्तपदी यानी सात फेरे और हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार आवश्यक धार्मिक अनुष्ठान होना अनिवार्य है।
न्यायमूर्ति राजीव सिंह की बेंच ने सशस्त्र सीमा बल (SSB) के एक अधिकारी को सेवा से हटाए जाने के आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की है। अदालत ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के 1971 के 'प्रिया बाला घोष बनाम सुरेश चंद्र घोष' मामले के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया।
क्या था पूरा मामला और SSB की कार्रवाई
याचिकाकर्ता रोहित पांडे के खिलाफ एक शिकायत दर्ज कराई गई थी, जिसमें आरोप था कि उसने साल 2007 में आर्य समाज मंदिर में सुचेता तिवारी से शादी की थी। इस मामले की आंतरिक जांच के बाद एसएसबी अधिकारियों ने माना कि पांडे ने बल में ज्वाइनिंग के समय अपनी वैवाहिक स्थिति के बारे में झूठी जानकारी दी थी।
इसी आधार पर विभाग ने उन्हें दोषी ठहराते हुए 28 अप्रैल 2022 को नौकरी से बर्खास्त कर दिया था। हालांकि, सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता रोहित पांडे ने खुद यह तर्क दिया था कि उसकी शादी हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार नहीं हुई थी। शिकायतकर्ता महिला ने भी अदालत में स्वीकार किया था कि विवाह में सप्तपदी और अन्य आवश्यक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न नहीं हुए थे।
अवैध शादी को बर्खास्तगी का आधार नहीं माना कोर्ट
विभागीय जांच के दौरान अधिकारियों ने आर्य समाज मंदिर के पुजारी के बयान और नोटरी प्रमाण पत्र के आधार पर शादी को वैध मान लिया था। इसके बाद रोहित पांडे ने 2015 में दूसरी महिला साधना तिवारी से शादी कर ली थी, जिसे विभाग ने अयोग्य आचरण करार दिया था।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब 2007 का कथित विवाह बिना सात फेरों और धार्मिक अनुष्ठानों के हुआ था, तो कानून की नजर में वह शादी ही नहीं थी। अदालत ने कहा कि जब विवाह कानूनी रूप से अमान्य था, तो जवान को नौकरी से बर्खास्त करने का आधार स्वतः ही समाप्त हो जाता है।
बर्खास्तगी का आदेश रद्द, 'नो वर्क, नो पे' का नियम लागू
अदालत ने एसएसबी के 28 अप्रैल 2022 के बर्खास्तगी आदेश को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है। साथ ही अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि रोहित पांडे को तुरंत प्रभाव से सेवा में बहाल किया जाए।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में 'नो वर्क, नो पे' (काम नहीं, वेतन नहीं) का सिद्धांत लागू होगा। इसके तहत पांडे को 28 अप्रैल 2022 से अदालत के आदेश की तिथि तक की अवधि का वेतन नहीं मिलेगा, लेकिन इस अंतराल को सेवा में व्यवधान नहीं माना जाएगा और उनकी पिछली सर्विस निरंतर बनी रहेगी।
